हड़प्पा सभ्यता: विकास, संस्कृति और विलिनीकरण

हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता, जिसेअंग्रेज़ी में “Indus Valley Civilization” भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप में (वर्तमान पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के भागों में पायी गयी थी। यह सभ्यता लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक मौजूद थी और समृद्धि और प्रगति के लिए अपने विशिष्ट संस्कृति और शौचालय प्रणाली के लिए प्रसिद्ध थी।

हड़प्पा सभ्यता को तीन मुख्य नगरों में विभाजित किया जा सकता है – हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगन। इन नगरों के चारों ओर से सिंचित किए गए नदियों जैसे सिंधु और घाघरा नदी ने इन सभ्यताओं को खेती और पानी के प्रबंधन में महान सफलता प्रदान की थी।

हड़प्पा सभ्यता की खोज

हड़प्पा सभ्यता की खोज ब्रिटिश प्राचीनता के शोधकर्ता और प्राकृतिक विज्ञानी सर जॉन मार्शल और सर राखलेवेय ने 1920 के दशक में की थी। इस समय ब्रिटिश राज्याधिकारियों और अध्यापकों ने उत्तरी भारत में विभिन्न स्थानों पर मोहेंजोदड़ो नामक खंडहरों और अवशेषों का अध्ययन किया था।

1921 में, सर जॉन मार्शल ने राखलेवेय के साथ मिलकर हड़प्पा सभ्यता की खोज की। उन्होंने सिंधु घाटी नदी तटों पर स्थित मोहेंजोदड़ो और हड़प्पा के खंडहरों का अध्ययन किया और इसे एक विशाल सभ्यता के अवशेषों का प्रमुख तथ्य बताया।

सर जॉन मार्शल ने विभिन्न योधा पुतलियों, सिक्के, अखाड़े, शौचालय और अन्य सभ्यता से संबंधित विषयों के अध्ययन करके समझा कि यह सभ्यता बड़ी व्यापारिक और विकासशील थी। इसे मोहेंजोदड़ो सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता के रूप में पहचाना गया और यह भारतीय उपमहाद्वीप में एक प्राचीनतम सभ्यता के रूप में मानी गई।

हड़प्पा सभ्यता की खोज से न हेवड़ा नदी के किनारे कई प्राचीन नगरों की खोज हुई जिनमें से हड़प्पा, मोहेंजोदड़ो, कालीबंगन, लोथल, बनवाली, दोलवीरा आदि विख्यात हैं। इन सभी स्थलों के खंडहरों और अवशेषों का अध्ययन से हमें हड़प्पा सभ्यता की विभिन्न विशेषताओं का पता चलता है और इससे इस सभ्यता के विकास और संस्कृति के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त होता है।

हड़प्पा सभ्यता की महत्वपूर्ण विशेषताएं:

  1. शहरी सभ्यता: हड़प्पा सभ्यता शहरी जीवन के एक उदाहरण के रूप में जानी जाती है। इसमें सड़कें, घरेलू नीतियों का पालन, शौचालय प्रणाली, सार्वजनिक इमारतें, गलियों का सुखाव, और शौकिया वस्त्र व्यापार आदि शामिल थे।
  2. लिपि संवर्धन: हड़प्पा सभ्यता के लोग विशेषकर मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के शहरों में खुद की बहुभाषिक छापने की कला के लिए प्रसिद्ध थे। इन्होंने लिपि के लिए सिक्के, मुहरे और चाँदी के सिक्के बनाए जिनमें अक्षरों का प्रचार होता था।
  3. धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता: वे धार्मिक रूप से संपन्न थे और विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते थे। मूर्ति पूजा, यज्ञ, पशु बलि, और बाकी धार्मिक अनुष्ठान भी इन्होंने किए जाते थे।
  4. व्यापार और वाणिज्यिक संबंध: हड़प्पा सभ्यता व्यापार में समर्थ थी और अनेक देशों के साथ वाणिज्यिक संबंध थे। मोहनजोदड़ो से खीटश्वरा (आफगानिस्तान) तक शिकारी संतति की खूबसूरत से सुशोभित गहना विक्रय होते थे।
  5. स्त्री शक्ति: इस सभ्यता में स्त्रियों को समाज में महत्वपूर्ण भूमिका दी जाती थी। महिलाओं को विभिन्न रूपों में देवी रूप में पूजा जाता था, और वे अपने समाज में सक्रिय भूमिका निभाती थीं।

हालांकि, हड़प्पा सभ्यता के अंत के पीछे की वजहें अज्ञात हैं। रीढ़ी-सीढ़ी व्यवस्था, आक्रोशी नस्लीय ध्वंस, या जलवायु परिवर्तन इसके संबंध में कुछ प्रस्तावित कारण हैं, लेकिन निर्धारित जवाब अभी तक नहीं मिला है।

हड़प्पा सभ्यता अपनी विकासशील और सदियों तक स्थिर रहने वाली सभ्यताओं में से एक थी जो विश्व के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसकी खोज और अध्ययन से हमें भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन समय के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त होता है।

हड़प्पा सभ्यता का नक्शा

सिंधु घाटी सभ्यता मोटे तौर पर प्राचीन दुनिया की अन्य नदी सभ्यताओं के समकालीन थी: नील नदी के किनारे प्राचीन मिस्र, यूफ्रेट्स और टाइग्रिस के साथ मेसोपोटामिया, और चीन में पीली नदी और यांग्त्ज़ी के जल निकासी बेसिन। यह पश्चिम में बलूचिस्तान से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक, उत्तर में उत्तरपूर्वी अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण में भारतीय राज्य गुजरात तक फैला हुआ था। इसे नीचे दिए गए मानचित्र में देखा जा सकता है:

हड़प्पा सभ्यता की मुहरें

हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से पुरातत्वविदों ने हजारों मुहरों की खोज की गई है। अधिकांश मुहरे स्टीटाइट, जो एक प्रकार का नरम पत्थर होता है, से बनाए गए थे। इनमें से कुछ टेराकोटा, सोना, सुलेमानी, चर्ट, हाथीदांत और फैयेंस से भी बनाए गए थे। सामान्य हड़प्पा मुहर 2X2 आयाम के साथ चौकोर आकार के थे।

हड़प्पा सभ्यता की मुहरों का उपयोग

ऐसा माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता की मुहरों का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था। कुछ मुहरों को ताबीज के रूप में लिया जाता था, शायद एक प्रकार के पहचान पत्र के रूप में भी। सभी मुहरों पर जानवरों के चित्र थे जिन पर चित्रात्मक लिपि में कुछ लिखा हुआ था (जिसे अभी तक समझा नहीं जा सका है)। मुख्य रूप से चित्रित जानवर बाघ, हाथी, बैल, बाइसन, बकरी आदि थे। अधिकांश मुहरों पर दोनों तरफ लिखा हुआ था। लेखन खरोष्ठी शैली (दाएँ से बाएँ) में था। कुछ मुहरों में गणितीय चित्र भी होते थे और इन्हें शैक्षिक उद्देश्यों के लिए बनाया गया था। सबसे प्रसिद्ध मुहर मोहनजोदड़ो से प्राप्त हड़प्पा सभ्यता की पशुपति मुहर थी।

हड़प्पा सभ्यता के पतन की कहानी

हड़प्पा सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, महत्वपूर्ण प्राचीन भारतीय सभ्यताओं में से एक थी। यह सभ्यता अपनी स्वच्छ शहरी नीति, अद्भुत नदी-नाला प्रणाली, सुव्यवस्थित सड़कों और स्थायी इमारतों के लिए जानी जाती थी। हालाँकि, इस प्राचीन सभ्यता के उत्कर्ष और समृद्धि की अवधि के बाद, एक समय ऐसा आया जब हड़प्पा सभ्यता का पतन शुरू हो गया।

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