सिंधु घाटी सभ्यता: एक प्राचीन सभ्यता का उद्गम स्थल

सिंधु घाटी सभ्यता :– विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। आज से लगभग 83 वर्ष पूर्व पाकिस्तान के ‘पश्चिमी पंजाब प्रांत’ के ‘माण्टगोमरी ज़िले’ में स्थित ‘हरियाणा’ के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों के निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में ‘जॉन विलियम ब्रन्टम’ ने कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।

सिंधु सभ्यता खोज:-

दोस्तों, सबसे पहले 1826 में एक ब्रिटिश यात्री जिनका नाम चार्ल्स मैसन था, वे पाकिस्तान के यात्रा पर गए, लेकिन दोस्तों यह याद रखियेगा की उस समय कोई पाकिस्तान नहीं था यह सारे क्षेत्र भारत के ही हिस्से थे, हम बस आपकी समझ के लिए आज के क्षेत्रों के नाम के हिसाब से आपको समझा रहे हैं।

जब चार्ल्स मैसन 1826 में पाकिस्तान क्षेत्र की यात्रा के लिए गए तब उन्हें वहां हड़प्पा क्षेत्र के कुछ हिस्से मिले और उसके बारे में उन्हें थोड़ी जानकारी प्राप्त हुई और चार्ल्स मैसन ने तब उस समय एक अनुमान दिया की उस क्षेत्र में कभी कोई सभ्यता रही होगी, लेकिन कोई स्पष्ट रूप से इनके द्वारा कुछ नहीं बताया गया था।

चार्ल्स मैसन के द्वारा नैरेटिव ऑफ़ जर्नीस ( Narrative of Journeys ) नामक एक पत्रिका भी निकाली गयी थी, जिसमें इन्होंने इस घटना का वर्णन किया था और फिर धीरे-धीरे यह घटना फैलना शुरू हुई थी।

इसके बाद 1856 में कराची और लाहौर के बीच एक रेल पथ का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसे दो इंजीनियर जेम्स बर्टन और विलियम बर्टन बना रहे थे, इन्हें बर्टन बंधु के नाम से भी जाना जाता है।

जब इन बर्टन बंधुओं के नेतृत्व में इस रेलवे लाइन के निर्माण का कार्य चल रहा था तब उन्हें इस क्रम में आसपास के क्षेत्रों कई ईटें प्राप्त हुई और इन्होंने उन ईटों को अपने इस रेलवे लाइन के लिए इस्तेमाल कर लिया था और तब इन्हें लगा था की यहाँ पहले कोई भवन रहा होगा, लेकिन इन्हें यह नहीं पता था की यह ईटें किसी सभ्यता का हिस्सा थी और इन्होंने इसके बारे में कुछ ढूंढ़ने का प्रयास भी नहीं किया था।

जिस व्यक्ति ने इस सभ्यता के संबंध में सबसे पहले खोज करने का प्रयास किया था वे अलेक्ज़ैंडर कनिंघम थे, जिन्हें भारत के पुरातात्विक विभाग का जनक भी कहा जाता है।

इन्होंने इन क्षेत्रों का 1853 से लेकर 1856 तक कई बार दौरा किया, परंतु इन्हें भी उस समय कोई बड़ी सफलता इसके संबंध में प्राप्त नहीं हुई थी और वे भी इस सभ्यता के संबंध में कोई व्यवस्थित जानकारी नहीं दे पाए थे।

इसके बाद 1921 में भारत के पुरातात्विक विभाग के प्रमुख सर जॉन मार्शल थे, और इनके नेतृत्व में इन क्षेत्रों में खुदाई का कार्य आरंभ हुआ था।

इस खुदाई के कार्य का नेतृत्व दो भारतीय व्यक्ति संभाल रहे थे, जिनका नाम दयाराम साहनी और राखल दास बनर्जी था, दयाराम साहनी जी को रायबहादुर दयाराम साहनी के नाम से भी जाना जाता है।

इस क्रम में दयाराम साहनी के नेतृत्व में हड़प्पा क्षेत्र की खोज की गई और राखल दास बनर्जी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो क्षेत्र की खोज करी गई थी और इस प्रकार सिंधु घाटी सभ्यता के प्रारंभिक खोजकर्ताओं के रूप में भी इनको देखा जाता है।

इस सभ्यता की खोज में सबसे पहले हड़प्पा क्षेत्र की खुदाई करी गई थी और वर्त्तमान में यह क्षेत्र पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के अंतर्गत आता है।

सिन्धु सभ्यता के नगर

इस काल के तीन प्रमुख नगर है:-हड़पा मोहनजोदड़ो और धौलाबीरा

हड़पा

सन् 1921 में सिधु सभ्यता के हड़प्पा नामक स्थल की खुदाई में दो विशाल एवं ध्वस्त टीले मिले। पश्चिमी टीला चतुर्भज दुर्ग के समान था, यह 420 मी. से 196 मी. तक लंबा-चौड़ा था। यह टीला 13.7 से 15.2 मी. ऊंचा था। किले को बुर्ज बनाकर मजबूत बनाया गया था। किले के बाहर कर्मचारियों के निवास व भवन, कारीगरों की कार्यशाला और अन्नागार बने हुए थे। कर्मचारियों के निवास किले के उत्तरी- पश्चिमी कोने में दस छोटे आयताकार भवन थे। वहीं आस-पास ही नाशपाती के आकार की 16 भट्ठियां मिली हैं। इन भट्ठियों में कोयले और गोबर की राख मिली है। लगभग 32 मी. दूर अन्नागार बने हुए हैं। इसके दक्षिण में अनाज की कुटाई के लिए ईंट के गोलाकार चबूतरे बने हुए हैं। हड़प्पा नगर के पार ‘सिंहद्वार नगर था, जोकि गोमल से आने वाले एवं ईरानी पठार को जाने वाले रास्तों को जोड़ता था । इस काल में भौतिकतावाद को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, इस तथ्य को सिद्ध करते हैं, हड़प्पा स्थल से पाए गए मिट्टी के बरतन, श्रृंग पत्थर के फलक, तांबें और कांसे के औजार, पकाई हुई मिट्टी की आकृतियां तथा छोटी-बड़ी मुहरें। दो ऐसी मूर्तियां मिली हैं, जिनके सिरों को कील के जरिए अन्य अंगों से जोड़ा गया है। एक मूर्ति का पेट उभरा हुआ है, जिसको यक्ष आदि का रूप माना जाता है। दूसरी मूर्ति धूसर पत्थर से बनी एक पुरुष की है। एक अन्य मूर्ति मिली है। नृत्य मुद्रा की इस मूर्ति की एक टांग उठी हुई है। मार्शल इसे नारी मूर्ति भी मानते हैं। यहां से जल प्रणाली वाले जलाशय, हाथी दांत की मुहर, तीखे नोकवाला सुआ, दुधारी चाकू, चिमटी तथा अन्य औजार भी मिले हैं। हड़प्पा नगर में शवाधान किले के दक्षिण में होता था। खुदाई में लगभग 57 शवाधान मिले हैं। मृतक के साथ उसके उपयोग में आनेवाली दैनिक वस्तुएं भी दफना दी जाती थीं। लगभग 12 शवाधानों में कांस्य के दर्पण मिले हैं। एक में सुरमा लगाने की सलाई तथा एक से सीपी की करछुल तथा पत्थर के फलक मिले हैं। कुछ शवाधानों के चारों ओर ईंटों की चिनाई भी की गई थी।

मोहनजोदड़ो:-

यह हडप्पा से लगभग 483 कि.मी. दक्षिण में सिंध के लरकाना जिले में स्थित है। मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है-‘मुर्दों का टीला’। आर. डी. बनर्जी एवं दयाराम साहनी ने 1922 में इस इलाके की खुदाई करवाई। इस उत्खनन में दो टीले निकले। पश्चिमी टीले के बीच एक नगर दुर्ग (200×400 मी.) तथा पूर्वी टीले के नीचे मोहनजोदड़ो के निचले नगर (400×800 मी.) दबे हुए थे। जॉन मार्शल ने 1922-30 ई., जे.एच. मैके ने 1927-31 ई., आर. एम. व्हीलर ने 1930-47 ई. तथा जी.एफ. डेल्स ने भी 1964-66 में इस स्थान का उतखनन करवाया। इन खोजों में भवनों के सात क्रमिक स्तर मिले हैं।

मोहनजोदड़ो के भवनों में जल आपूर्ति, स्नान एवं जल निकास के लिए नालियां बनी हुई थीं। कुछ घरों में दोनों मंजिलों पर पाश्चात्य शैली के शौचालयों के चिह्न भी मिले हैं। मल की निकासी के लिए इन्हें ढालदार बताया गया था। कुछ में मेहराबदार नालियां बनी हुई थीं, जो दीवार से होकर मिट्टी के भांड़ों में या मली की नाली में मल पहुंचाती थीं। प्रत्येक व सड़क के साथ-साथ पानी निकलने के लिए नाली बनी हुई थी। सड़क के साथ-साथ की गलियों की नालियां प्राय: छोटी होती थीं। छोटी नालियों प्रायः ईंटों से ढंकी होती थीं। चौड़ी नालियों को ढंकने के लिए पत्थर की शिलाएं प्रयुक्त की जाती थीं। शहर की कुछ नालियां 6-7 फीट बैंक चौड़ी होती थीं। इन नालियों में कहीं-कहीं सीढ़ियां भी बनी हुई थीं, ताकि नीचे उतरकर सफाई की जा सके।

जल व्यवस्था का भी उत्तम प्रबंध था। पानी के लिए कुंए बने हुए थे। रोष में मिले कुओं की मेद (किनारों पर रस्सी के निशान भी मिले हैं। अधिकतर मकान 26×36 फीट के होते थे, लेकिन कुछ मकान इनसे दुगने व और अधिक बड़े होते थे। मोटी दोकारें मकानों का बहुमंजिला होने का साक्ष्य देती हैं। दीवारें 25 फोट के लगभग ऊंची मिली हैं, जिनमें छेद भी हैं। शहतीरें लगाकर दूसरी मंजिल बनाई गई थी। कमरों के दरवाजे अनेक प्रकार के होते थे। छोटे दरवाजे 3 फीट 4 इंच चौड़े होते थे। बड़े दरवाजों से बैलगाड़ियां और रथ आदि निकल जाते थे। अलमारियां दीवार के साथ बनी हुई थीं। मोहनजोदड़ो का सबसे प्रसिद्ध भवन विशाल स्नानागार है।

दुर्ग इलाके में ईंटों से बना हुआ यह भवन उत्कृष्ट है। जलाशय आयताकार है, जोकि उत्तर से दक्षिण 11.88 मी. लंबा तथा 7.01 मी. चौड़ा और 2.43 मी. गहरा है। उत्तर और दक्षिण की तरफ सीढ़ियां हैं, जो जलाशय के तट तक जाती हैं। जल रिसाव रोकने के लिए चूने के गारे का प्रयोग किया गया है। बाहरी दीवार और ईंटों के बीच तारकोल की परत लगाई गई है। सीढ़ियों के ऊपरी तल पर तारकोल की मदद से लकड़ी लगाई गई है। स्नानागार में जल की आपूर्ति कुओं के द्वारा होती थी। स्नानागार के चारों ओर मंडप एवं कक्ष बने हुए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि इन कक्षों को विशेष पुरोहित प्रयोग में लाते थे। वे निर्धारित समय पर स्नान या धार्मिक अनुष्ठान करने नीचे आते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि इन कक्षों का इस्तेमाल कपड़े बदलने के लिए किया जाता था। लॉकन यह सत्य है कि धार्मिक समारोहों में इनका प्रयोग होता था। इस विशाल स्नानागार के उत्तर-पूर्व में एक लंबा भवन था, जिसका उपयोग एक उच्चाधिकारी, संभवतः मुख्य पुरोहित के आवास अथवा पुरोहितों के सभाकक्ष के रूप में किया जाता था। इसमें 10 वर्ग. मी. का खुला आँगन था। इस कक्ष के ठीक पश्चिम में कमरों के परिसर में बैठे हुए पुरुष की पत्थर की मूर्ति मिली है। इसके पास बड़े तराशे हुए पत्थर के छल्ले मिले हैं। ये शायद धार्मिक अनुष्ठान प्रस्तर स्तंभ के टुकड़े हैं। मोहनजोदड़ो से अनेक भौतिक अवशेष मिले हैं। यहां से लगभग 1398 मुहरें ‘मिली हैं। पूलधर, कारण और पकाई गई मिट्टी की मूर्तियों से नागरिकों की सौंदर्यानुभूति का भान होता है। मुहरों पर पशु बलि, मातृदेवी की उपासना, पशु एवं वृक्ष पूजा तथा शिव-पशुपति आदि का चित्रण भी मिला है। पत्थर की मुहर पर जहाज का चित्रण ताबीज पर जहाज का चित्रण, बैठी हुई महिला की मृणमूर्ति, बच्चे को दूध पिलाती हुई माता की मूर्ति, चीनी मिट्टी की गिलहरी की लघु आकृति, कुत्ते के शरीर पर दाढ़ीयुक्त मानव सिर आदि से यह स्पष्ट है कि इस काल की कला एवं संस्कृति अति विशिष्ट थी।

धौलावीरा:-

यह स्थान गुजरात के कच्छ जिले के चाऊ तालुके में स्थित है। इसकी खोज डॉ. आर. जी. पी. जोशी ने की थी। सन् 1990-91 डॉ. आर.एस. बिष्ट ने यहां व्यापक रूप से उत्खनन कार्य किया। यह एक विशाल दुर्ग एवं सुरक्षा व्यवस्था से युक्त नगर था। यहां सूचारु जल व्यवस्था थी यहां पर नगर तीन भागों में विभाजित था, दो भाग आयताकार प्राचीरों द्वारा घिरे हुए थे। यहां 70 से 140 मी. चौड़े विशाल खुले क्षेत्र एवं सुरक्षात्मक प्राचारों से जुड़े हुए हैं। धौलावीरा की बस्तियों में प्रवेश के लिए भव्य प्रवेशद्वार बन हुए थेपास के प्रकोष्ठ भी बने हुए थे। काल का एकमात्र क्रीड़ागार (stadium) भी यहाँ पर पाया गया है। यहां का समाज कई स्तरों में बंटा हुआ था। यहां के निवासी जल संरक्षण करने में कुशल थे। रोक-बांध एवं जलाशयों में पानी एकत्रित किया जाता था। 80.4 मी. 12 मी. विशाल जलाशय 7.5 मी. गहरा था, जिसमें 2,50,000 घन पानी जमा हो सकता था। यह नगर इन विशेषताओं के कारण सिंधु सभ्यता के उत्कृष्ट नगरों की श्रेणी में आ गया।

महत्वपूर्ण प्रश्न


सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब की गई थी?
1921 में भारत के पुरातात्विक विभाग के प्रमुख सर जॉन मार्शल थे, और इनके नेतृत्व में इन क्षेत्रों में खुदाई का कार्य आरंभ हुआ था।

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज किसने की थी?
दयाराम साहनी के नेतृत्व में हड़प्पा क्षेत्र की खोज की गई और राखल दास बनर्जी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो क्षेत्र की खोज करी गई थी और इस प्रकार सिंधु घाटी सभ्यता के प्रारंभिक खोजकर्ताओं के रूप में भी इनको देखा जाता है।

सिंधु घाटी के प्रमुख देवता कौन थे?
इस सभ्यता के सबसे प्रमुख देवता पशुपतिनाथ को ही माना जाता है, इस सभ्यता के लोग मातृ देवियों की भी पूजा करते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता किसने लिखी थी?
चार्ल्स मैसन के द्वारा नैरेटिव ऑफ़ जर्नीस ( Narrative of Journeys ) नामक एक पत्रिका भी निकाली गयी थी, जिसमें इन्होंने हड़प्पा क्षेत्र का वर्णन किया था।

सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य नाम क्या है?
सिंधु एवं सरस्वती सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता।

सिंधु सभ्यता में पवित्र जानवर क्या था?
इस सभ्यता में लोग कूबड़ वाले सांड का पशुपालन करना पसंद करते थे और यह सबसे प्रिय पशु माना जाता था।

सिंधु घाटी की सभ्यता का अंत कैसे हुआ?
इस सभ्यता के पतन का कारण बाढ़ को माना है, और बाढ़ को ही सबसे ज्यादा विद्वानों ने अपनी सहमति दी है अर्थात बाढ़ को ही इस सभ्यता के पतन का सबसे बड़ा कारण माना गया है।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन कब हुआ?
इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1800 ईसा पूर्व तक सिंधु घाटी सभ्यता का पूर्ण रूप से पतन हो गया था।

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